Sunday, January 19, 2014

सत्ता और शासक

       

        जिस देश की  चौहद्दी कच्छ के रेगिस्तान  से लेकर त्सांग की  पहाड़ियों तक हो, सियाचिन से लेकर कन्याकुमारी तक हो, जिस देश की  सभ्यता ५००० साल से भी पुराना हो ( लिखित श्रोतों के अनुसार),  जिस देश में ४०० से जायदा भाषा और २००० से जयादा बोलियां बोली जाती हों , जिस देश में दर्जन भर धर्मों के अनुयायी हों, जिस देश में ६५० के लगभज जनजातियां हों, उस भू-खंड का स्वामित्व का निर्णय करने वाला कोई एक मानसिकता का  कैसे हो सकता है? ऊर्जा जहाँ के नवयुवकों कि पूंजी हो, जिनकी बौद्धिक तर्कता की सारे जहाँ में लोहा माना  जाता हो, आधी से जयादा जन-संख्या  जहाँ ३५ वर्ष से कम आयु कि हो, उस भू-खंड का स्वामित्व का निर्णय करने वाला कोई एक मानसिकता का  कैसे हो सकता है?
        दर्जनों संस्कृतियाँ पनपी, हमारे संस्कृति  के समांनांतर ।  कुछ विलुप्त हो गए, कुछ हज़ारों सालों के थपेड़े खा के कमजोर हुए और भौतिकतावाद, निरंकुशतावद और तानाशाह में परवर्तित हो गये । एक 'जम्बू-द्वीप' या फिर कहें कि 'भारतवर्ष' की  सभ्यता ही थी, जिसने उपर्युक्त आंकड़ो को अपने आलिंगन में सहेजे मुम्बई की लोकल ट्रेन  की  तरह संस्कृति की  भार को कभी असंतुलित नहीं होने दिया । आक्रांताओं का आक्रमण हुआ, फिरंगियों का आक्रमण हुआ,  संस्कृति के साथ-साथ और धर्म-परिवर्तन की भी कोशिश हुयी।  इतिहास को विजेताओं ने अपनी तरह से लिखा ।
         प्रश्न ये है कि, इतने बड़े भू-खंड के स्वामित्व, संस्कृति, मानसिकता, धर्म,जाति , बोली-भाषा कि जिम्मेदारी लेना किसी एक मनुष्य के बस की  बात है? अगर कोई दम भरे कि हम एक 'स्व-राज' बनाएंगे जहाँ सब एक बराबर होंगे,  सबको बराबर का अधिकार मिलेगा,  केंद्र कि स्वायत्ता को  न्यून कर सत्ता का विकेंद्रीकरण किया जाएगा, 'आम' नागरिक के हाथ में सत्ता दिया जाएगा । यह सम्भावना एक विरल स्वपन मात्र  ही प्रतीत होता हैं ।  ऐसी सोच रखने वाले या तो भारतीय संस्कृति और सभ्यता से अनभिज्ञ हैँ या तो देश को गलत सन्देश दे रहे हैं , देश के नागरिकों को गुमराह कर रहे हैं ।
        पुस्तकों में या चलचित्र में 'समानता' शब्द बड़ा ही सार्थक होता है, धरातल पर यह  यथार्थ-परे होता है ।  इस्तिहास मौन होकर इस शब्द की  प्रत्याक्षता  का  प्रमाण देता है । समाजवाद में प्रजा प्रधान होती है, शासक गौण।   यह एक परिकल्पना मात्र है । यथार्थ में शासक ही प्रजा के अच्छे-बुरे का भविष्य-विधाता होता है । शासक निष्पछ और कर्म-प्रधान हो तो ऐसा समाज और रास्ट्र  विकास के मार्ग पर अग्रशील होता है, समाज का एक बड़ा तबका खुशहाल होता है, द्वेष-ईर्ष्या कि भावना न्यून होता है। किसी कारणवश अगर समाज में विद्रोह या असमंजसता की  भावना पनपती भी है तो शासक का धर्म और कर्तव् होता है कि बहुल की  सुरक्षा एवं स्वयमितता के लिए उन अपद्रवों का शमन करे, विनाश करे, दमन करे । ऐसे में शासक का कुशल,शक्तिशाली, संगठित, अनुशाशन-प्रधान, पारदर्शी और निर्णयकारी होना अति-आवश्यक है ।
        इतिहास के पन्नो को अगर पलटे और अपनी सोच को थोडा विकसित कर के यथार्थ को स्वीकार करें तो प्रतीत होगा कि कालांतर में ऐसे ही शासकों ने  'भारत-वर्ष' पर शासन  किया । चाहे वह राजा  हरिश्चंद्र हों, भगवान  राम हों, भववान कृष्ण हों, मनु-पुत्र 'भरत' हों, चन्द्रगुप्त हो, अशोक हो, विक्रमदित्य हों, हर्षवर्धन हों। हर के शासक ने नागरिकों कि सुरक्षा और विकास को ध्यान में रखकर अपने साम्राज्य का विस्तार  किया । 
        हज़ारों आक्रमण और आक्रांताओं को झेल चूका भारत-वर्ष में राजनीति कोई नहीं चीज नहीं । जहाँ सत्ता हो, वहाँ राजनीति को परे रखना असम्भव है।  पुरातन-कल में राजे-महाराजे अपने राज्य और भूखंड को बचाने  के लिए समान मत वाले राजाओं से संधि करते थे, राज्य के अंदर बहु-दल कि प्रथा नहीं थी, चूँकि राजा ही प्रधान होता था । यरोपियन सभयता में बल-प्रधान शासन कि वयवस्था थी, और भारतीय संस्कृति में राजनैतिक संधि और राजनैतिक परिवेश्य में शासन होता था । आम नागरिक की  भागेदारी तब भी न्यून थी ।  औधोगिग क्रांति और और २१ वीं शताब्दी के आगमन से विज्ञान के माध्यम से लोगों की  विचार-धारा  में परिवर्तन आया और आम नागरिको के अधिकार पे जयादा जोर दिया जाने लगा । सदियों से जो नागरिक और उनके पूर्वज अपने आप को शासक वर्ग से अलग समझते थे, उन्हें  भी शासन में भागीदारी देने की बात की  गयी । यों तो ये गणतंत्र शब्द कि उत्पति  ३००० साल पुराणी है और वैशाली नामक  जनपद ही विश्व का प्रथम गणतांत्रिक जन-पद था । इसकी चर्चा भी इस 'ब्लॉग' की परिसीमा से परे है ।
         १९ वीं और २० वीं  शताब्दी से , जन-आंदोलनो के बाद समाज-वाद और  जन-तंत्र पर जयादा जोर दिया जाने  लगा । विश्व के कई राष्ट्रों  में ये एक समग्र क्रांति का शतक था । आम नागरिक के मध्य से कई ऐसे क्रांतिकारियों और एकता का अधिकार दिलाने वाले आंदोलन-कारियों का अभ्युदव हुआ । हिटलर, मुसोलिनी, फिडेल-क्रास्टो जैसे क्रन्तिकारी इसी वर्ग में आते हैं । प्रारम्भ में नागरिकों को ऐसे क्रांतिकारी और आंदोलन-कारी एक नायक कि तरह दीखते हैं, जो कि उनके लिए शासक वर्ग से लड़ रहा होता है , कालांतर में ऐसे ही आंदोलनकरी और क्रन्तिकारी एक 'नाज़ीस्ट ' या 'फासिस्ट' का स्वरुप ले लेता है, जिसको सिर्फ उसकी ही करनी घर्म-अनुकूल दिखती हैं और बाकियों का धर्म, राष्ट्र-विरुद्ध । ये जन-आंदोलन समाज-वाद को लेकर प्रारम्भ होती है परन्तु इनका समापन 'निरंकुशवाद' और 'तानाशाह ' पर होता है ।  यौं  तो आप इससे भारत-वर्ष की  सभ्यता-संस्कृति कि संज्ञा दीजिये या अनेकता में एकता वाली बंधन-सूत्र की  शक्ति की उपलब्धि मानिये , भारत-वर्ष में ऐसे निरंकुश और तानाशाह  शासक-वर्ग की उत्पति  एक परिकल्पना मात्र  रही है । गर्व होने कि बात है बात है और स्वयं-भू का अधिकार भी देती है  ये सभ्यता-संस्कृति ।
      वर्त्तमान में भारतीय राजनीति  कुछ ऐसे ही दौर से गुजर रहा है । आतंकवाद , सीमा-का उलंघन, अवैध घुसबैठ , महंगाई , बेरोजगारी चरम सीमा पर है । विडंबना ही है कि ये भौगोलिक सीमाएं एक धर्म, एक समुदाय विशेष वाले राष्ट्रों को  सूचित करती हैं, और ये धर्म-विशेष ही भारतीय राजनीति  और राजनेताओं के भाग्य  का निर्धारन करने में अहम् भूमिका योगदान करता है । रास्ट्र कि सीमाओं पर  कठोर कारवाही करने कि स्थिति में यहाँ के राजनितिक दल अपना जनमत से हाथ धो बैठेंगे । गरीब तबका और गरीब होता जा रहा है महंगाई की  मार से  आम नागरिक त्रस्त है, युवा वर्ग  बेरोजगारी कि समस्या से झूझ रहा है।  शासक वर्ग कहने को तो लोकतान्त्रिक हैं तरीके से चुने गए हैं, परन्तु समाज की समस्या सुलझाने की  जगह अपनी समस्यायों के समाधान में जयादा वयस्त हैं । ऐसे राजनितिक परिवेश में कोई  क्रन्तिकारी और आंदोलनकारी मनुष्य या समूह अगर समाज के युवा वर्ग और बुध्धिजीवी वर्ग को अपनी विचारधारा में सम्मोहित करने में सफल होता है तो कोई हैरानी की  बात नहीं। सबको अधिकार है, अपने सपने को साकार करने का, अपनी महत्वकांक्षा को सिद्ध करने का । कीमत चाहे समाज और रास्ट्र  की  अखंडता और स्वयं-भूता  ही क्यों न हो । इतिहास साक्षी है कि समाज और शासक-वर्ग  की कर्म-विहीनता और कुरूतियों से त्रस्त होकर समाज का एक व्यक्ति या एक वर्ग आंदोलन का मार्ग चुनता है। आम नागरिक को स्वपन दिखता है समानता की , समाजवाद की,  परन्तु ऐसे आंदोलन के  परिणाम-स्वरुप एक समाज-वाद कि संरचना  हो सकती है, इतिहास इसका कुछ स्पस्ट प्रमाण नहीं देता ।
         देश के  नागरिकों और युवा वर्ग के लिए बुद्धि -विकास की  शक्ति दिखने की कड़ी चुनौती है । किसी एक वयक्ति-विशेष या राजनितिक सामुदाय के प्रति तन-मन-धन अपर्पित करने के बजाय, एक अखंड भारत कि छवि पहले रखें अपने मन-मस्तिस्क में ।  अपनी व्यक्तिगत समस्या के समाधान के लिए कालांतार में देश-और राज्य को अर्थ-संकट और धर्म-संकट में ना डालें । ऐसे किसी भी राजनेता या राजनैतिक दल का समर्थन ना करें । असल  'स्व-राज' वह है, जब आप अपने शासक को अपने ऊपर अधिकार देते हैं,  शासन करने के लिए। जो अधिकार पुत्र, पिता को देता है, अनुज, अग्रज को देता है, सेवक,  स्वामी को देता है, पत्नी पति को देती है।  भारतीय शासन -व्यवस्था में नागरिकों की  सीधी भागीदारी का प्रमाण तो इतिहास नहीं देता, कारण  स्पस्ट है, विविधताओं में एकता का देश, अनेकता में एकता का रास्ट्र । किसी एक बुद्धिजीवी को अपने बौद्धिक क्षमता से खेलने का अवसर  ना दें ।  याद रहे कि राजनेता और राजनैतिक दल आते-जाते रहेंगे परन्तु अखंड 'भारत-वर्ष' को  अखंड रखना हमारा प्रथम कर्त्तव्य और धर्म  है।