Sunday, December 22, 2013

राष्टीयता अवं भारतीय शिक्षा प्रणाली

      
          "जन गण मन अधिनायक जय हे ", " नन्हा मुन्हा रही हूँ देश का सिपाही हूँ", " मेरे देश कि धरती सोना उगले, उगले हीरा मोती ", "वंदे मातरम" .... और ना जाने कितने ऐसे देशभक्ति गीत जो कि अब सिर्फ १५ अगस्त और २६ जनवरी के दिन या तो किसी राजनितिक रैलियों में ही अब सुनने को मिलता है।  बाकी दिनों में बच्चे अपने माता-पिता के सपनो को साकार करने वाली अध्ययन में ४ किलो का बस्ता पीठ पे लटकाये नज़र आते  हैं। 'शर्मा जी' और 'गुप्ता जी'  के बच्चे से हमारा बच्चा किसी भी प्रतिस्पर्धा में पीछे ना रह जाए , ये आज़ - कल के माता-पिता का प्राइम एजेंडा बन गया है।
          हर एक हाथ में  मोबाइल जैसे मूलभूत आवश्यकता सी लगती है। अंग्रेजी में 'हाई -हेल्लो' करना जैसे पढ़े-लिखे और सभ्य होने का प्रमाण देता हो। अंग्रेजी माध्यम में बच्चों को पढ़ाने  की  होड़ सी  लग गयी है। ये एक जरूरत भी है और मजबूरी भी । डांस, म्यूजिक, स्विमिंग, पेंटिंग और ना जाने ऐसे कई शौक जो कि मध्यम वर्ग के माता-पिता  नहीं कर पाये किसी मजबूरी वश या यों कहें कि आर्थिक मज़बूरी के कारण, आज वो अपने बच्चों  से करवाना चाहते हैं, मानो जैसे अपनी जिंदगी जी रहें  हों।  एक सदस्य की  आमदनी से अब घर चलना आसान नहीं रह गया ऊपर से महंगाई की  कमरतोड़ मार। सब भाग रहे हैं अच्छी  जीवन-शैली की  तलाश में। सब को अच्छा खाना, अच्छे कपडे और अच्छा दिखना है। और ये कोई गलत भी नहीं है। सबको समान का अधिकार है।
            अब सवाल ये आता है है कि जब लोग अपने जीवन को सँवारने में ही वयस्त हैं तो देश को  और समाज को ठीक करने की  जिम्मेदारी कौन ले ? अरविंद और मोदी हमारे कौन हैं? वो हमारे लिए क्यों लड़ेंगे ? व्यवस्था  ठीक करने का क्या उन्होंने ठेका ले रखा है? देश और समाज की  मौजूदा स्थिति के लिए राजनेताओं से जयादा दोषी मैं देश की  शिक्षण प्रणाली को मानता हूँ । भारत आज एक बाज़ार सा बन गया है पुरे विश्व के लिए, इस वैश्वीकरण के दौर में । कहीं कुछ भी बनाओ, भारत में बेचो। कहीं कुछ भी बनाओ, सस्ते मजदूर भारत से ले जाओ। अच्छा जीवन गुजारने  की  लालशा  युवकों को पश्चिम कि तरफ हमेशा से खींचती रही  है ।   वैश्वीकरण  के बाद से तो स्थिति और भी भयावह हो गयी है।  हिंदी-भाषी प्रधान देश होने के बावजूद भी हिंदी बोलने में संकोच करते हैं लोग, कहीं उन्हें  समाज से 'बैकवर्ड'  का सर्टिफिकेट न  मिल जाये। चीन, जर्मनी, फ्रांस वालों को अपनी भाषा बोलने में कतई संकोच नहीं जबकि वो हमारे एक राज्य के बराबर या उससे भी कम हैं ।  पप्पू कहीं गुप्ता जी के बेटे से पीछे से ना रहे इसलिए पप्पू की  मम्मी  जबरन  पप्पू  से अंग्रेजी में बात करती है । उनके यहाँ कोई मेहमान आता है तो  पप्पू के ऊपर एक प्रेशर सा बन जाता है परफॉर्म करने का, " पप्पू बेटा  वो इंग्लिश वाली पोएम सुनाओ ऑंटी  को, वो डांस करके दिखाऊ अंकल को, वो पेंटिंग दिखाओ … " और पप्पू शरमा  के ऊँगली या कमीज का कोना हाथ में लिए नज़र नीचे करके खड़ा रहता है … पप्पू को समझ में नहीं आता कि माँ-बाप के समाज के साथ  प्रतिष्पर्धा में उसके ऊपर प्रेशर क्यों दिया जा  रहा है।
          इंटरनेट, मोबाइल और सूचना -तकनीक  ने जैसे दुनिआ ही बदल दिया हो । लोगों  का नजरिया एकदम से बदला सा लगता है। ऐसे में देश और समाज के बारे में सोचने से पहले लोग अपनी जीवन शैली को और अच्छा बनाने में जयादा वयस्त हैं । फिर सवाल वहीँ का वहीँ  रह गया । ऐसे में देश अगर निकृष्ट श्रेणी के राजनेता चला रहे हैं तो गलती किसकी  है?  आखिर दोषी कौन है? हम या वो राजनेता? आखिर उन्हें  चुनता कौन है ? हम या वो खुद अपने आप को चुनते हैं ? जवाब एकदम सीधा  एवं  सरल है? वो जन प्रतिनिधि हैं और उन्हें जनता ही चुनती है। फिर जनता से ये चूक कैसी?  क्यों वो नेताओं को दोषी देते हैं ? दोषी तो हम हुए ना ? फिर चूक  कहाँ हैं ?
        चूक है हमारे शिक्षण-प्रणाली में । जिस उम्र में बच्चों कि खेलने और सकारात्मक पढाई करने कि उम्र होती है १०-१४ साल के बीच, उस समय उन्हें देश भक्ति पढाई जाती है, किताबों में सिर्फ गांधी और नेहरू को ही देश का 'बाप' या 'चाचा' बताया जाता है, सिर्फ इन दोनों ने ही मिलके अंग्रेजो से लड़ा और देश को आजादी दिलाई । उस अपरिपक्व उम्र में ये गांधी-नेहरू ही उनके हीरो बन जाते हैं । भारत का मतलब गांधी-नेहरू और गांधी -नेहरू का मतलब भारत । लोक-सभा, राज्य-सभा, विधान-सभा , सांसद, विधायक, रास्ट्र और रास्ट्रीयता कि शिक्षा जिस उम्र में भारतीय विद्यार्थियों को दी जाती  है उसे  मैं सबसे जायदा दोषी मानता हूँ ।  जब एक मनुष्य की  उम्र १८ साल से ऊपर होती है तब जाकर वह देश-समाज, धर्म-संस्कार, अच्छा-बुरा, जात-पात, उंच-नीच, शासन -व्यवस्था समझने की  क्षमता  रखता है ।  परन्तु भारतीय शिक्षा प्रणाली कि ये चूक  है कि इस उम्र में छात्र व्यवसायिक शिक्षा के में जुट जाते हैं जो कि अन्यथा ही गलत नहीं है पर वो रास्ट्रीयता कि शिक्षा जो ८-१० साल पहले हुयी होती है अविकसित मस्तिस्क में, उससे अनभिज्ञ हो जाते हैं । स्नातक या स्नातोकोत्तर कि उपाधि के बाद जब रोजगार की तलाश में बाज़ार में कूच करते हैं तो व्यवस्था उन्हें जर्जर नज़र आती है, हर तरफ भ्रष्टाचार ही नज़र आता है।  कारण साफ़ है की जब ये मेधावी छात्र अपनी जीवन-शैली सुदृढ़ करने में लगे थे तो देश और समाज की प्रशाशन की  बागडोर कोई मोहल्ले का अनपढ़ दबंग अपनी हाथो में ले रहा होता है , जात के नाम पर, पैसों के दम पर या बहु-बल के दम पर ।
          ऐसे में राजनेताओ को दोष देना कितना उचित है ? दोषी वो हैं या हमारी शिक्षा प्रणाली ?  दोषी वो हैं या हमारे अभिभावक ? कम से कम अभिभावक एक वयस्क बच्चे को उसकी जिम्मेदारी समझा सकते हैं, देश के प्रति, समाज के प्रति। परन्तु वो भी उसी होड़ में रहते हैं कि कहीं उनका पप्पू ज़माने के रेस में पीछे  रह  जाए, देश और समाज तो कोई और भी चला लेगा ।  जब तक देश की शिक्षा-प्रणाली में उच्च-विद्यालय और महाविद्याल  स्तर पर राष्ट्रीयता कि शिक्षा नहीं दी जायेगी, एक  वयस्क विधार्थी को देश और समाज के प्रति उनका कर्त्तव्य और उत्तरदायित्व नहीं समझाया जाएगा , तब तक भारत-वर्ष ऐसा ही रहेगा, और देश ऐसे ही  राजनेताओं  के सहारे रहेगा और उन्हें लाइसेंस देने वाले होंगे  देश के अभिभावक  और देश की  शिक्षा-प्रणली।